संत ज्ञानेश्वरने गुरू के प्रति आदर व्यक्त करते हुए कहा हैं, आप भवरूपी तमको नष्ट करनेवाले भास्कर हो। आपका सामर्थ्य अतुलनीय है। आप मानों भक्तोंके वन के चंदन हो। आपकीही क्षमाशीलता इस पृथ्वी ने अपनायी है। आकाशने आपसेही विशालत्व प्राप्त किया है । भवसागर के मदसे भरे हुए हाथीका गंडस्थल भंग करने आप समर्थ हो। विषयवासना के सर्पका जहर आपकी कृपासे नष्ट होता है। आपकी कृपासे विद्या का कमल खिलता है। अविद्या की रात समाप्त हो जाती है।
आपका स्तवन करना चाहता हूँ, लेकिन करुँ कैसे?
क्या कर्पूर को सुगंध अर्पित किया जा सकता है?
क्या चंदनको सुगंधित द्रव्य लगानेकी आवश्यकता है?
क्या अमृतको पकाया जा सकता है?
क्या गगनपर कोई ध्वज लगा सकता है?
क्या कल्पतरुको फूलोंकी जरुरत है?
फिर भी यदि स्तवन करूँगा तो मानों
मोतियोंको अभ्रक का लेप लगाये जैसा होगा।
शुध्द सुवर्णको रजत का पानी देने जैसा होगा।
फिरभी आपका ममत्व मुझे आपका स्तवन करने विवश कर रहा है।
मुझे ज्ञात है कि उपमन्युने जब दूध माँगा तब शिवजीने उसके लिए क्षीरसागर निर्माण किया। बाल ध्रुव रूठ गया तो विष्णुजीने उसे अटल, अचल ध्रुवपद प्रदान किया। आपकीही कृपासे विश्वामित्रजी ने प्रतिसृष्टी निर्माण की।श्रीरामजी की वानरसेना सागर उल्लंघन कर सकी।
आपके इस स्तवनसे मैं कृतकृत्य हुआ हूँ । सभी लोगोंको आपकी कृपा प्राप्त हो।
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