धर्म का अर्थ है कर्तव्य। हरेक व्यक्ति का समाज में जो स्थान है उसपर उसका कर्तव्य निर्भर रहता है। समाजरचना में उस कर्तव्य का एक विशेष स्थान रहता है। वह न निभानेसे गड़बड़ी हो सकती है। कभी कभी अन्य कर्तव्य धारण करनेवालोंको देखकर, मैं भी वैसा करुं यह भाव निर्माण हो सकता है।
ज्ञानेश्वरीमें कहा है,
१. पड़ोसीका बड़ा मनोहर पक्का बंधा हुआ घर देखकर मैंने अपनी कुटी मोड़ डालना क्या ठीक रहेगा? (साथ ही साथ स्वातंत्र्यवीर सावरकरजी की याद आती है। उन्होंने कहा है," मेरी कुटीही मुझे बहुत प्यारी है। )
२. पत्नी की क्षमता, उसके गुण, कर्तव्यतत्परता, स्वजनोंके प्रति होनेवाली ममता तथा कर्तव्य भाव, त्याग करनेकी तैय्यारी आदि गुणोंपर परिवार की खुशहाली निर्भर है। अत: उसके सौंदर्य की चर्चा करना आवश्यक नहीं है।
३. शायद स्वकर्तव्याचरण करना कष्टप्रद होगा लेकिन वही करना योग्य है।
४. परधर्म का आचरण करनेका मोह अयोग्य है। दूध में शक्कर डाली तो वह अधिकही रचकर होता है लेकिन जिसके पेटमें कृमी हो गए है उसके लिए वह हानिकारक होता है।
साथही साथ यहभी ध्यान में रखना है कि एकही व्यक्ति को अनेक कर्तव्य एकसाथ निभाने पड़ते है। मैं एक कन्या, भगिनी, पत्नी, माता हूँ, साथ साथ राष्ट्र की सेवा के लिये बध्द परिकर समाज का एक घटक भी हूँ।
'स्वधर्मे, स्वमार्गे परमंश्रद्धया' अविचल रहने का मेरा अड़िग प्रण है।
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