भारतीयोमे कर्तव्योंकी सीढ़ी का एक क्रम मान लिया है। वह है व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व । 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम' की उद्घोषणा के अनुसार विश्व को श्रेष्ठ बनाने के लिये हम प्रतिबद्ध है। व्यक्ति और परिवार के उन्नयन के लिये स्वाभाविक रूपसे हम प्रयत्नशील रहते है। समाज के प्रति दायित्व का बोध हमें प्रयत्नपूर्वक ध्यान में रखना पडता है।
समाज सजीव होनेके कारण समाजमे उतार चढाव होतेही रहते है। कभी कभी अधर्म का अवडंबर मच जाता है। ऐसे समय अधर्म को नष्ट कर धर्म को प्रस्थापित करने भगवान अवतार धारण करते है, यह हमारा विश्वास है और उसकी अनुभूति हमें बारबार आती है।
हमारे दशावतार, साधू संत, चंद्रगुप्त, शिवाजी जैसे राष्ट्र पुरुष, परकीय सत्ता से समाज को मुक्त करने अपना सर्वस्व समर्पण करनेवाले वीर, समाजोत्थान के लिये प्रयत्नशील रहे चाणक्य, रामदास, लोकमान्य तिलक, न्या.महादेव रानडे, महात्मा गांधीजी, स्वातंत्र्यवीर सावरकर जैसे नेतागण, रणरागिणी लक्ष्मी, समाज का स्वाभिमान जागृत करनेवाली तथा उसकी सेवा करनेवाली देवी अहल्याबाई, शिवाजी जैसा स्वतंत्रता प्राप्त करनेवाला वीर निर्माण करनेवाली जिजामाता आदियोंके चरित्रमे इसका अनुभव होता है और हरेकको अपना दायित्व निभानेका संदेश प्राप्त होता है।
ज्ञानेश्वरीमें वर्णन है कि भगवान कहते है, मै
१) अज्ञान का अंधेरा प्राशन कर लेता हूँ।
२) अधर्म की सीमाये तोड देता हूँ।
३) सज्जनोंद्वारा सुख की ध्वजा लहराता हूँ।
४) अविवेक की कालिमा नष्ट करता हूँ।
५) विवेक का दीप जलाता हूँ।
६) पाप का पहाड नष्ट भ्रष्ट करता हूँ।
हरेक व्यक्तिने अपना दायित्व और कर्तव्य जानकर उसे निभाने कटिबध्द रहना है।
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