रविवार, २८ फेब्रुवारी, २०१६

चिंतनसूत्र- ७ श्रोतागण

संत ज्ञानेश्वरजीने सामने बैठे वाले श्रोतागणको वंदन करते हुए कहा, 
शरदऋतु के चंद्रप्रकाश में कोमल अमृतकण चुगनेवाले आप चकोर है।कमलदलको ज़रा भी धका न लगाते हुए परगसेवन करनेवाले आप भ्रमर हो| 
स्वयं का स्थान न छोड़ते हुए भी चंद्रमाको आलिंगन देनेवाली कमलिनी जैसी आपकी माया है।
अपने बच्चे के कर्तृत्वसे संतुष्ट होनेवाली माता जैसा आपका प्यार है।
आपके सामने विषय प्रतिपादन करना यह मानो -
सरस्वतीपुत्र को पढ़ाना जैसा है।
सूरज के सामने जुगनू का प्रकाश। 
अमृत के थालीमे मिष्टान्न परोसना|
शीतल चन्द्र को पंखा ढालना|
नादब्रम्ह को संगीत सुनाना|
गहनोंको गहने चढ़ाना|
सागर को स्नान डालना|
सुगंध को इत्र अर्पित करना|
आप सब प्रेमभरे होने के कारणही मैं आपके सामने बोल सकता हूँ।

शुक्रवार, २६ फेब्रुवारी, २०१६

चिंतनसूत्र ६ - गुरुमहिमा

संत ज्ञानेश्वरने गुरू के प्रति आदर व्यक्त करते हुए कहा हैं, आप भवरूपी तमको नष्ट करनेवाले भास्कर हो। आपका सामर्थ्य अतुलनीय है। आप मानों भक्तोंके वन के चंदन हो। आपकीही क्षमाशीलता इस पृथ्वी ने अपनायी है। आकाशने आपसेही विशालत्व प्राप्त किया है । भवसागर के मदसे भरे हुए हाथीका गंडस्थल भंग करने आप समर्थ हो। विषयवासना के सर्पका जहर आपकी कृपासे नष्ट होता है। आपकी कृपासे विद्या का कमल खिलता है। अविद्या की रात समाप्त हो जाती है।

आपका स्तवन करना चाहता हूँ, लेकिन करुँ कैसे?
क्या कर्पूर को सुगंध अर्पित किया जा सकता है?
क्या चंदनको सुगंधित द्रव्य लगानेकी आवश्यकता है?
 क्या अमृतको पकाया जा सकता है?
क्या गगनपर कोई ध्वज लगा सकता है?
 क्या कल्पतरुको फूलोंकी जरुरत है?

 फिर भी यदि स्तवन करूँगा तो मानों
 मोतियोंको अभ्रक का लेप लगाये जैसा होगा।
 शुध्द सुवर्णको रजत का पानी देने जैसा होगा।
 फिरभी आपका ममत्व मुझे आपका स्तवन करने विवश कर रहा है। 

मुझे ज्ञात है कि उपमन्युने जब दूध माँगा तब शिवजीने उसके लिए क्षीरसागर निर्माण किया। बाल ध्रुव रूठ गया तो विष्णुजीने उसे अटल, अचल ध्रुवपद प्रदान किया। आपकीही कृपासे विश्वामित्रजी ने प्रतिसृष्टी निर्माण की।श्रीरामजी की वानरसेना सागर उल्लंघन कर सकी।

आपके इस स्तवनसे मैं कृतकृत्य हुआ हूँ । सभी लोगोंको आपकी कृपा प्राप्त हो। 

चिंतनसूत्र ५ - धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे


भारतीयोमे कर्तव्योंकी सीढ़ी का एक क्रम मान लिया है। वह है व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व । 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम' की उद्घोषणा के अनुसार विश्व को श्रेष्ठ बनाने के लिये हम प्रतिबद्ध है। व्यक्ति और परिवार के उन्नयन के लिये स्वाभाविक रूपसे हम प्रयत्नशील रहते है। समाज के प्रति दायित्व का बोध हमें प्रयत्नपूर्वक ध्यान में रखना पडता है।

समाज सजीव होनेके कारण समाजमे उतार चढाव होतेही रहते है। कभी कभी अधर्म का अवडंबर मच जाता है। ऐसे समय अधर्म को नष्ट कर धर्म को प्रस्थापित करने भगवान अवतार धारण करते है, यह हमारा विश्वास है और उसकी अनुभूति हमें बारबार आती है।

हमारे दशावतार, साधू संत, चंद्रगुप्त, शिवाजी जैसे राष्ट्र पुरुष, परकीय सत्ता से समाज को मुक्त करने अपना सर्वस्व समर्पण करनेवाले वीर, समाजोत्थान के लिये प्रयत्नशील रहे चाणक्य, रामदास, लोकमान्य तिलक, न्या.महादेव रानडे, महात्मा गांधीजी, स्वातंत्र्यवीर सावरकर जैसे नेतागण, रणरागिणी लक्ष्मी, समाज का स्वाभिमान जागृत करनेवाली तथा उसकी सेवा करनेवाली देवी अहल्याबाई, शिवाजी जैसा स्वतंत्रता प्राप्त करनेवाला वीर निर्माण करनेवाली जिजामाता आदियोंके चरित्रमे इसका अनुभव होता है और हरेकको अपना दायित्व निभानेका संदेश प्राप्त होता है।

ज्ञानेश्वरीमें वर्णन है कि भगवान कहते है, मै
१) अज्ञान का अंधेरा प्राशन कर लेता हूँ।
२) अधर्म की सीमाये तोड देता हूँ।
३) सज्जनोंद्वारा सुख की ध्वजा लहराता हूँ।
४) अविवेक की कालिमा नष्ट करता हूँ।
५) विवेक का दीप जलाता हूँ।
६) पाप का पहाड नष्ट भ्रष्ट करता हूँ।
हरेक व्यक्तिने अपना दायित्व और कर्तव्य जानकर उसे निभाने कटिबध्द रहना है।


चिंतनसूत्र ४ - स्वधर्मे निधनं श्रेय:


धर्म का अर्थ है कर्तव्य। हरेक व्यक्ति का समाज में जो स्थान है उसपर उसका कर्तव्य निर्भर रहता है। समाजरचना में उस कर्तव्य का एक विशेष स्थान रहता है। वह न निभानेसे गड़बड़ी हो सकती है। कभी कभी अन्य कर्तव्य धारण करनेवालोंको देखकर, मैं भी वैसा करुं यह भाव निर्माण हो सकता है। 
 ज्ञानेश्वरीमें कहा है, 
१. पड़ोसीका बड़ा मनोहर पक्का बंधा हुआ घर देखकर मैंने अपनी कुटी मोड़ डालना क्या ठीक रहेगा? (साथ ही साथ स्वातंत्र्यवीर सावरकरजी की याद आती है। उन्होंने कहा है," मेरी कुटीही मुझे बहुत प्यारी है। )
२. पत्नी की क्षमता, उसके गुण, कर्तव्यतत्परता, स्वजनोंके प्रति होनेवाली ममता तथा कर्तव्य भाव, त्याग करनेकी तैय्यारी आदि गुणोंपर परिवार की खुशहाली निर्भर है। अत: उसके सौंदर्य की चर्चा करना आवश्यक नहीं है।
३. शायद स्वकर्तव्याचरण करना कष्टप्रद होगा लेकिन वही करना योग्य है। 
४. परधर्म का आचरण करनेका मोह अयोग्य है। दूध में शक्कर डाली तो वह अधिकही रचकर होता है लेकिन जिसके पेटमें कृमी हो गए है उसके लिए वह हानिकारक होता है। 
साथही साथ यहभी ध्यान में रखना है कि एकही व्यक्ति को अनेक कर्तव्य एकसाथ निभाने पड़ते है। मैं एक कन्या, भगिनी, पत्नी, माता हूँ, साथ साथ राष्ट्र की सेवा के लिये बध्द परिकर समाज का एक घटक भी हूँ।
 'स्वधर्मे, स्वमार्गे परमंश्रद्धया' अविचल रहने का मेरा अड़िग प्रण है।