संत ज्ञानेश्वरजीने सामने बैठे वाले श्रोतागणको वंदन करते हुए कहा,
शरदऋतु के चंद्रप्रकाश में कोमल अमृतकण चुगनेवाले आप चकोर है।कमलदलको ज़रा भी धका न लगाते हुए परगसेवन करनेवाले आप भ्रमर हो|
स्वयं का स्थान न छोड़ते हुए भी चंद्रमाको आलिंगन देनेवाली कमलिनी जैसी आपकी माया है।
अपने बच्चे के कर्तृत्वसे संतुष्ट होनेवाली माता जैसा आपका प्यार है।
आपके सामने विषय प्रतिपादन करना यह मानो -
सरस्वतीपुत्र को पढ़ाना जैसा है।
सूरज के सामने जुगनू का प्रकाश।
अमृत के थालीमे मिष्टान्न परोसना|
शीतल चन्द्र को पंखा ढालना|
नादब्रम्ह को संगीत सुनाना|
गहनोंको गहने चढ़ाना|
सागर को स्नान डालना|
सुगंध को इत्र अर्पित करना|
आप सब प्रेमभरे होने के कारणही मैं आपके सामने बोल सकता हूँ।